शनिवार, 10 दिसंबर 2016

क्या चर्बी ( FAT ) जरुरी है ?

त्वचा के नीचे चर्बी (FAT) होती है जो शरीर के गड्ढों को भरकर सुंदर बनाती है | जिनमें चर्बी नहीं होती वह देखने कितने दुर्बल और बुरे मालूम होते है | 
चर्बी अधिक होने वाले होने से भी आदमी भद्दा मालूम होता है | चर्बी एक ऐसा पदार्थ है जो शरीर की गर्मी को बाहर जाने से रोकती है और बाहर की ठंड को अंदर आने से रोकती है | यह शक्ति का संचार भी करती है |
इसे वास्तव में शरीर का इंधन कहा जाता है | जब मनुष्य को भोजन नहीं मिलता तो यही चर्बी पिघल-पिघल कर शरीर की मशीन को चलाने में भोजन का काम करती है | 
जिस मनुष्य को शुद्ध वायु नहीं मिल पाती, बैठकर काम करना पड़ता है तथा अधिक चलने फिरने का या शारीरिक व्यायाम करने का अवसर नहीं मिलता उस की चर्बी तथा श्वेतसार ( जो वह भोजन द्वारा प्राप्त करता है ) शक्ति में परिवर्तन ना होकर त्वचा के नीचे जमा होने लगता है तथा शरीर को मोटा भद्दा और निष्क्रिय बना देता है |  
यही चर्बी या FAT है | हर मनुष्य में चर्बी होना आवश्यक है मगर ज्यादा चर्बी होने से मनुष्य भद्दा, मोटा और रोगी बन जाता है |

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कुछ लोग गोर और कुछ लोग काले क्यों ? हमें त्वचा की साफ सफाई क्यों करनी चाहिए ?


त्वचा का शरीर के अंदर सब वस्तुओं को ढकती है और शरीर के ताप को समान अवस्था में रखती है | साथ ही साथ हमारे शरीर पर होने वाले कीटाणु और जीवाणुओं के बाहरी आक्रमण से भी शरीर का बचाव करती है |

यदि बाहर से शरीर में अधिक गर्मी घुसने लगती है तो त्वचा पर पसीना आ जाता है | शरीर को कुछ शीतलता मिलती है | और जब बाहर से अधिक सर्दी मिलती है तो त्वचा सिकुड़कर मोटी हो जाती है, शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और शरीर के अंदर के अवयव बाहर की ठंड से बच जाते हैं  | 

त्वचा की कई तहे होती हैं | त्वचा की बाहर की त्वचा कुछ कड़ी और मोटी होती है | त्वचा के नीचे रंग के कण ( पिगमेंट ) होते हैं जो ताप से शरीर की रक्षा करते हैं | जिन देशों में गर्मी अधिक पड़ती है, वहां यह कण शरीर की रक्षा हेतु अधिक होते हैं | जिससे मनुष्य का रंग काला पड़ जाता है जैसे अफ्रीका देशों में मनुष्य अधिक काले होते हैं |  जिन देशों में ठंड पड़ती है वहां यह कण बहुत कम या बिल्कुल नहीं होते जैसे युरोप अमरीका आदि के निवासी अधिक या कम गोरे होते हैं | 

ऊपरी त्वचा के नीचे असली त्वचा होती है जिसमें दो प्रकार की छोटी-छोटी  ग्रंथिया होती हैं | एक में से पसीना निकलता है जिसके द्वारा रक्त के अंदर के कुछ विकार बाहर निकल जाते हैं | दूसरे में से चिकनाई निकलती है जो बालों व त्वचा को नर्म रखती है | ऊपरी त्वचा में करोड़ों छोटे छोटे छिद्र होते हैं जिनको पोर्स या मुसाम कहते हैं | यदि यह छिद्र कई बार मेल के कारण बंद हो जाते हैं क्योंकि शरीर के अंदर की चिकनाई बाहर निकलती है और उस पर बाहर की धूल जम जाती है | छिद्रों के बंद होने से अंदर का विष नहीं निकल पाता और शरीर रोगी हो जाता है | इस प्रकार इस कारण शरीर की बाहरी सफाई अनिवार्य रूप से करनी चाहिए |




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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

शरीर का ताप

प्रकृति की सारी रचनाओ में शरीर की 'रचना' एक बड़ा कठिन, जटिल किंतु बहुत सुंदर विषय है | यह एक बड़ा भारी कल (मशीन) है | जिस को चलाने वाली एक शक्ति इसमें रहती है | 

इस शरीर को  पूरी तरह से ना सही तो इसका साधारण ज्ञान प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है | और विशेषकर तब जब हम चाहें कि हमारी यह मशीन  (शरीरबहुत लंबी अवस्था तक चलती रहे | 

हमारे देश में औसत आयु केवल 60 वर्ष है | जबकि अन्य देशों में 80 वर्ष तक है | इसका कारण यह है कि वहां के मनुष्य को इस मशीन (शरीर) को चलाना आता है और हमें नहीं | 

आप किसी भी मनुष्य को छुए तो उसमें कुछ ताप अवश्य प्रतीत होता है और यही ताप सारी मशीन (शरीर) को चलाने के लिए आवश्यक है | कभी यह ताप बढ़ भी जाता है और कभी घट भी जाता है | यह प्रत्येक व्यक्ति के भोजन या रोग पर निर्भर है | साधारण स्वस्थ अवस्था में मनुष्य के मुंह के अंदर का आप 98.6 डिग्री  फॉरेनहाइट और बगल का 97.6 डिग्री फारेनहाइट होना चाहिए |

शरीर रुपी मशीन के चलते रहने के लिए आवश्यक वस्तुए

प्रकृति की सारी रचना में शरीर की रचना एक बड़ा कठिन, जटिल किंतु बहुत सुंदर विषय है | यह एक बड़ी भारी मशीन है जिस को चलाने के लिए एक शक्ति इस में रहती है | इस मशीन को चलाने के लिए आवश्यक है संतुलित भोजन, जल और वायु |

Video on this Topic :-
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जो कुछ भी हम खाते हैं हम उसको भोजन कहते हैं एक साधारण भ्रम जो जनता में वर्षों से फैला हुआ है लोगों की शरीर को स्वस्थ व बलिष्ठ बनाने के लिए मूल्यवान भोजन की आवश्यकता होती है | इस विचार में कदापि भी सत्यता नहीं है | भोजन के ज्ञान से निर्धन से निर्धन मनुष्य उसको पोषक तथा बलवर्धक बना सकता है और भोजन को अज्ञानता से धनवान से धनवान मनुष्य विष के समान बना सकता है |सत्यता इस बात पर है कि उचित समय पर उचित मात्रा में उचित रुप में निश्चित होकर खाया हुआ भोजन सदा ही लाभदायक रहता है |

यदि निराहार बगैर भोजन के रहकर मनुष्य 20 दिन तक जीवित रह सकता है, तो निर्जल व निराहार रहकर केवल 5 दिन ही जीवित रह सकता है |
कुछ भी हो जल शरीर का एक अति आवश्यक अवयव है | पानी शरीर के भार का 66 पतिशत होता है | पानी के बिना जीवित रहना दुर्लभ है | सादा शीतल जल ही शरीर के लिए सदा लाभदायक होता है | बर्फ मिला पानी हानिकारक होता है | दिन भर में मनुष्य को लगभग 3 किलो पानी अवश्य इस मशीन रूपी शरीर में डालना चाहिए  | जिस की मात्रा सर्दी गर्मी में कम या ज्यादा की जा सकती है | 
निराहार निर्जल रहकर तो 5 दिन जीवित रहा जा सकता है किंतु वायु के बिना तो एक पल भी जीवित रहना दुर्लभ है | इसी कारण शरीर के लिए वायु अति आवश्यक है | जो मनुष्य बंद कोठरियों में और सकरी गलियों में रहते हैं वे सदैव किसी न किसी रोग से ग्रस्त र


हते हैं | प्रतिदिन 2-4 बार शुद्ध हवा में आकर 2-4 गहरी लंबी सांसे लेने से बहुत से रोगों के होने की संभावना समाप्त हो जाती है | यह वह वस्तु है जो इस शरीर रुपी मशीन के चलते रहने के लिए आवश्यक है  | जिनकी सहायता से यह चलती हुई मशीन महान से महान कार्य कर सकती है |

हमें विश्राम की जरूरत क्यों होती है ?
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गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

क्या काम करते रहने से ही शरीर में शक्ति का संचार होता है ?

जीवन में परिश्रम और विश्राम दोनों साथ-साथ चलने चाहिए तभी सुख शांति प्राप्त हो सकती है | मगर कुछ लोगों का विचार है कि काम करते रहने से ही शरीर में शक्ति का संचार होता है | यह उन लोगों कि बड़ी भारी भूल है | ऐसे लोगों को क्या यह भी बताना पड़ेगा कि काम करने में शक्ति का व्यय ही होता है | संचय या संचार नहीं | 

सच बात तो यह है कि जीवन धारण के लिए जितनी आवश्यकता वायु, जल, भोजन की है ,  विश्राम की आवश्यकता शरीरिक संरक्षण के लिए उनसे किसी भी हालत में कम नहीं है |

यूरोप, अमेरिका आदि देश आज भारत से प्रत्येक क्षेत्र में बढे हुए हैं |  इसके अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है कि उन देशो के निवासी सच्चे अर्थ में परिश्रम के बाद विश्राम करना जानते हैं | 

वहां क्या वृद्ध, क्या युवक, क्या स्त्री, क्या पुरुष, क्या धनी और क्या निर्धन, सबने अपने दैनिक कार्यो के लिए समय निर्धारित कर रखा है अर्थात 24 घंटो में 8 घंटा काम करने के लिए और 8 घंटा आराम करने के लिए | वे इस नियम का बड़ी कढ़ाई और इमानदारी से पालन कर रहे हैं जिसका परिणाम जो कुछ भी हो वह संसार के सामने हैं | 

गत महायुद्ध के समय दुश्मन के बमों की बोछार की छांव में भी लन्दन महानगरी के सभी विश्राम स्थल-हाइड पार्क आदि चालू रहे और उनमें हजारों की संख्या में अथक परिश्रम नर-नारी विश्राम के लिए भरे रहते थे | 

इतिहास के जानकारों से यह बात छिपी नहीं है कि वाटर लू के घमासान युद्ध के चन्द ही मिनट पहले महावी


र नेपोलियन पर विजय प्राप्त करने वाला Duke of Wellington घोर परिश्रम के बाद विश्राम कर रहा था | 

मानसिक व शारीरिक कोई काम हो सर्वप्रथम मन से उस काम के करने के लिए प्रवृत्ति होती है | तत्पश्चात मस्तिष्क में विचार उठता है विचार से चेतना की उत्पत्ति होती है जिससे उस काम के करने वाले अंग एवं अवयव में एक प्रकार की उत्तेजना रूपी तरंग का प्रादुर्भाव होता है और  स्नाइयू द्वारा प्राण अथवा शरीर की जीवनी शक्ति मस्तिष्क से तुरंत वहां पहुंचकर उस अंग या अवयव विशेष को गति देती है और हम उस काम को करना आरंभ कर देते हैं | इसी प्रकार मनुष्य कासारा कार्य होता है | 

अब यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यदि शारीरिक स्नायु मंडल में परिश्रम द्वारा जीवन शक्ति को केवल व्यय ही करना पड़े और विश्राम द्वारा उस व्यय कि हुई जीवन शक्ति को पुनः प्राप्त करने का मौका न दिया जाए तो शरीर इस अत्याचार को कितने दिनों तक सहन करता रहेगा | निश्चय ऐसी दशा में उसका एक न एक दिन विनाश होना अनिवार्य है |

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हमें विश्राम की जरूरत क्यों होती है ?


शरीर के लिए विश्राम उतना ही आवश्यक है जितना भूख के लिए भोजन | 
यदि कोई मनुष्य समस्त दिन बगैर रुके परिश्रम ही करता रहे तो वह निश्चित है कि वह कुछ ही घंटों में उसका शरीर विश्राम न मिलने के कारण थक कर चूर-चूर हो जाएगा और ऐसे मनुष्य का शरीर बहुत दिनों तक टिक नहीं सकता | 
मनुष्य को मनुष्य निर्जीव रेल गाड़ी के इंजन तक को यदि उचित विश्राम ना मिले, लंबी दौड़ के बाद दूसरे इंजन से वह न बदला जाए, उसके कलपुर्जे नित्य रोजाना साफ न किए जाएं तो वह एक कदम भी आगे नहीं चल सकता |
संसार के जीव जंतु पशु पक्षी आदि सभी परिश्रम के बाद आराम चाहते हैं |
यह सारी सृष्टि भी अपने विनाश काल में एक दिन विश्राम करती है ईसाईयों की धर्म पुस्तक बाइबल में भी इस बात की ओर संकेत है |
 विश्राम के समय मनुष्य के मस्तिष्क और शरीर के सारे अवयव, इंद्रियां स्थिर हो जाते हैं और विश्राम के बाद शरीर में, मस्तिष्क में दुबारा बल और ताजगी का अनुभव होने लगता है परिश्रम से खोई हुई जीवनशक्ति (एनर्जी) को दुबारा अर्जित करने के लिए ही विश्राम की आवश्यकता होती है |
हम जानते हैं कि हमारे शरीर में जो हृदय नाम का एक यंत्र है | वह 24 घंटे में 1,00,000 बार से अधिक ध


क-धक करता है और हमारी 12,000 मील लंबी रक्त वाहिनियों में लगभग 5,000 गैलन खून को दौड़ाता है | पर इस महत्वपूर्ण और कठिन कार्य को वह भी बिना विश्राम लिए नहीं करता और ना कर सकता है | दो 'धक' शब्दों के बीच जो समय होता है वह हृदय के विश्राम करने का समय होता है |
इतने थोड़े से समय में वह विश्राम करके इतनी अपार शक्ति ग्रहण कर लेता है जिसे वह मनुष्य के मरने तक क्रियाशील रहता है | इसलिए विश्राम के समय में विश्राम के संबंध में जो बातें दृदय के लिए सत्य है वही मनुष्य शरीर के प्रत्येक अवयव के लिए भी सत्य है |

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बुधवार, 7 दिसंबर 2016

ऋतु की जलवायु भिन्न-भिन्न, ठंडी की ऋतु के आहार

प्रत्येक ऋतु की जलवायु भिन्न-भिन्न होने से शरीर पर उसका भिन्न-भिन्न असर होता है इसलिए ऋतु के अनुसार आहार में भी आवश्यक परिवर्तन करना 
चाहिए | 
ऐसा करने से ऋतु की ठंडी गर्मी या अन्य असर सहन करने और उनका प्रतिकार करने की शारीरिक शक्ति बनी रहेगी |
ठंडी की ऋतु में जठराग्नि प्रदीप्त होती है अतः आहार के रूप में मधुर तथा स्निग्ध पदार्थों का सेवन करना 
चाहिए | 
शक्ति का संचार करने हेतु शीतकाल में दूध, घी  और पाको रसायनों का अधिक सेवन करें | 
सामान्य घी, गुड, तिल, मूंगफली, हलवा, सुखड़ी, उड़द-पाक आदि खाएं
आवले, बेर, गन्ना, गाजर, टमाटर, बैंगन, मुंगरी, पालक की भाजी और फल खाने चाहिए |  
इनका सेवन करने से शरीर हृष्ट-पुष्ट एवं ताजगीपूर्ण बनेगा |